एक दिन, दो ऐतिहासिक लम्हे – जलियांवाला बाग़ और सियाचिन: जहां एक को शहादत, तो दूसरे को मिला हिम्मत का नाम

इस साल वसंत नवरात्रों के आखिरी दिन में राम नवमी के त्यौहार का खुमार छाया हुआ है. मगर साथ-ही-साथ आज दो ऐसे समय याद किए जाते हैं , जिन्होंने हमारे इतिहास में एक बड़ा मोड़ ला दिया था. पहला: जलियांवाला बाग़ का नरसंहार, और दूसरा भारतीय सेना की सियाचिन में फतह. ख़ास बात ये है, कि जलियांवाला बाग़ के इस दर्दनाक किस्से को आज 100 बरस पूरे हो गए हैं. वहीँ सियाचिन के इस जीत के जश्न को 35 बरस हो गए हैं.

जलियांवाला बाग़ नरसंहार:
प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय सेना ने अंग्रेजी ताकतों का इस बात पर साथ दिया, कि ब्रिटिश राज से आज़ादी नसीब होगी. मगर अपने विश्वासघाती स्वभाव को कायम रखते हुए अंग्रेज़ों ने बदले में रौलट एक्ट घोषित कर दिया। इस दौरान पंजाब और बंगाल क्रांतिकारी और राजनैतिक गतिविधियों के मुख्य केंद्र थे. पंजाब के दो मशहूर राष्ट्रीय नेता; डॉ. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू को अंग्रेज़ों ने गिरफ्तार कर लिया था. इस निंदनीय घटना का विरोध करने के लिए, बैसाखी के दिन (13 अप्रैल 1919) बहुत लोग अमृतसर के जलियांवाला बाग़ में जमा हुए.

कहा जाता है, कि रौलट एक्ट की जानकारी बहुत लोगों को नहीं थी. इसके तहत लोगों को इकट्ठा नहीं होने दिया जाता और ज़मीन पर रेंगते हुए चलना होता था. पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल ओ’डायर के आदेश पर जनरल रेगीनाल्ड डायर को जलियांवाला बाग़ पर नरसंहार करने का आदेश दिया गया. सबसे दर्दनाक बात ये थी, कि गोलियों के चलाने के आदेश से पहले, जनता को ना चेतावनी दी गई थी, और ना कोई दरवाज़ा खाली छोड़ गया था.

जलियांवाला बाग़ के इस दर्दनाक किस्से ने जैसे दुनिया को हिलाकर रख दिया था. क्रांतिकारी गतिविधियों में बढ़त आ गई थी, जहां दो नाम आगे चलकर सबके दिलों में बस गए थे: उधम सिंह, जिन्होंने लंदन जाकर माइकल ओ’डायर की हत्या की (जनरल डायर का इससे पहले देहांत हो गया था) और दूसरा नाम: भगत सिंह, जिन्होंने जलियांवाला बाग़ के इस दर्दनाक किस्से को अपने ज़हन में लाकर अंग्रेज़ों को भारत से निकाल बाहर करने की कसम खाई थी.

सियाचिन की फतह:
यूनाइटेड नेशंस (यू एन) के बताये गए कश्मीर में नियत्रण रेखा लद्दाख सेक्टर में NJ9842 पर खत्म होती है और उसके आगे सियाचिन की बर्फीली रेगिस्तान शुरू हो जाती है. अब 1949 के कराची समझौते और 1972 के शिमला समझौते पर इस बात पर खासा तवज्जो नहीं दी जा रही थी, कि इस इलाके पर किसका अधिकार रहेगा.


1973 से पाकिस्तान ने बहुत-से पर्वतारोही अभियानों को सियाचिन में चढ़ाई करने की छूट देनी शुरू कर दी थी, जिसमें पाकिस्तान के सैनिक भी शामिल होते गए. अब ये बात भारत की नज़र में आ गई थी. 1978 में नए-नए शुरू हुए हाई अलटीट्यूड वारफेयर ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट पर ज़्यादा-से-ज़्यादा सैनिक अब ट्रेनिंग ले रहे थे. इसकी कमान कर्नल नरेंद्र कुमार को सौंपी गई थी. इस दौरान भारतीय सेना अब ऊंची चढ़ाई पर युद्धाभ्यास में काफी हद तक कुशलता हासिल कर चुके थे. तो इसके लिए कई मॉडर्न गियर और उपकरणों की ज़रूरत थी, जिनमें आर्कटिक गियर सबसे महत्वपूर्ण है. मज़े की बात ये थी कि जिस डीलर से भारत ये गियर ले रहा था, उसी डीलर से पाकिस्तान भी ले रहा था. ये खबर भारतीय अधिकारियों को हाथ लग गई. वहीँ कई अमरीकी अखबारों और मैग्ज़ीनों ने सियाचिन को पाकिस्तानी इलाका घोषित कर दिया.


इस बीच कर्नल नरेंद्र ने 70 लोगों की टीम के साथ सियाचिन की चोटियों पर चढ़ाई की, और उनपर तिरंगा लहराया। इस बात से पाकिस्तानी फ़ौज हताहत हुई. अब धीरे-धीरे दोनों देश अपने फौजीयों की तादाद बढ़ाते गए. इसके बाद, 13 अप्रैल 1984 को भारतीय सेना के लद्दाख स्काउट्स और 4 कुमाऊँ रेजिमेंट ने सियाचिन पर हमला बोला, जिसमें कम समय में ही उनको फतह मिली. कहते हैं कि कई पाकिस्तानी सैनिक गोलियों से कम बल्कि फ्रॉस्टबाईट से मारे गए थे. ये पहली दफा थी, जब सियाचिन में कोई सैन्य कार्रवाई हुई और भारत विजयी रहा.

इसके 3 साल बाद, ऑपरेशन राजीव के दौरान पाकिस्तान ने 21,153 फ़ीट की ऊंचाई पर एक पोस्ट बनाया। मगर ये सफलता कुछ ही दिन हाथ रही, जब लेफ्टिनेंट राजीव पांडे और नायब सूबेदार बना सिंह के नेतृत्व में भारतीय सेना ने इस पोस्ट को अपना कब्ज़े में किया। ये एक वर्ल्ड-रिकॉर्ड था, जब किसी सेना ने दुनिया की सबसे ऊंची पोस्ट पर अपना कब्ज़ा जमाया. 1999 तक पाकिस्तान ने सियाचिन से छीने हुए अपने कई मंसूबों को हासिल करने के लिए बहुत कोशिशें की, मगर भारतीय सेना ने इसे कभी कामयाब होने नहीं दिया.
इससे पाकिस्तान को अपने मुल्क में और यहां तक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारी निंदा मिली. उनके लिए सियाचिन का जाना, बांग्लादेश के आज़ाद होने जितना शर्मनाक था.

वाकई में, इन दोनों घटनाओं से देशभक्ति की भावना हमारे ज़हन से जाने का नाम नहीं लेती. ऐसे में मशहूर क्रांतिकारी अशफ़ाक़ुल्लाह खान की कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं:
शहीदों के मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मरने वालों का बाकी यही निशां होगा..

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